प्यास बढ़ती ही गई

अनुक्रम
शीर्षक
अपनी बात
आमुख
मैं विवश हूँ
तुम कुछ तो रस में डूबो
गीतों का सत्य
जीवन से प्यार
घरबार न पूछो
मेैं पीकर प्यास बढ़ाता
फिर मनुहारें करवाते
क्यों तुमने स्वप्न रचाये
हम लुटकर भी जी लेंगे
वाणी तुम्हें उचारे
मैं निश्चय करके हारा
मन जब मुक्तमुक्त रोता है
पर तुम खोलो मैं बँध लूँ
क्षण बीते किन्तु अमर हो
एक दिन कोई मिला था
पर भाव नहीं गूँजेगा
प्यास प्यार की
भावुकता ढाल रहा हूँ
भरोसा स्वयं का रहा साथ मेरे
जगत से संदेशा कहूँगा तुम्हारा
मैं उदास हो गया
यौवन फिर मुसकाता
परीक्षागान
मन को मैं समझाकर लाता
चाँदनी का गीत
आशा जवीन का धन है
परीक्षापूजा
प्यार तो मन का जता दो
वन की बहार
सावन की तीज
सुहागरात
गुलाबी होली
सुहागरात मनाकर आनेवालों से
इन गीतों में कौन समाया
तुम सूने में क्या गाती हो
रानी तान भरो
द्वार बजी शहनाई
पाकर सारी जीत गँवाई
वर्ष की घडि़याँ सभी बसन्त हैं